तुम से मिल ना पाऊँगा!
तुम्हारी महफ़िल से मैं जब चला जाऊँगा
लाख बुलाओगे , तो भी नहीं आ पाऊँगा
नहीं मालूम, तब मैं किस जहाँ में रहूँगा
तारीकी सही, तुम्हें तो भुला ना पाऊँगा!
सफ़र-ए ज़ीस्त तुम्हारा साथ, किया खूब
तुम मेरे रहे और मैं तुम्हारा, किया कहना
चाहत जन्नति लम्हों की होगी ता क़यमत
कसक है, लिज़्ज़तों को चूम ना पाऊँगा!
इंतेज़ार आमद की तुम्हारी, फैलाए हाथ
हूरों की क़तार से तुम्हें बस चुन ही लूँगा
दौज़ख़ी तनवीर, जन्नत तेरे नसीब कहाँ
ब-दुआ रहूँगा, तुम से मिल ना पाऊँगा!
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